Followers

Saturday, September 6, 2014

शिक्षक, शिक्षा और शिक्षक दिवस - 1

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 
कल राष्ट्रीय शिक्षा दिवस था।  यह दिवस भारत के महान शिक्षावादी, राजनीतिज्ञ और भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति तथा दूसरे राष्ट्रपति रहे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. आज़ाद भारत के निर्माण में उनका बहुत अतुलनीय योगदान है। आज हम सब उनके 126 वें जन्मदिवस पर उन्हें नमन करते हुए हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते है। सादर।। 

कहते है माता - पिता के बाद अगर किसी का स्थान है तो वो है गुरु अर्थात शिक्षक का। लेकिन आज हम कहीं ना कही अपने प्राचीन काल के शिक्षकों और उनकी शिक्षाओं को भूल रहे है। संसार में सभी (कुछ को छोड़कर) लोग भगवान, ईश्वर, अल्लाह और गॉड की पूजा करते है, उन्हें ही वो अपना माता - पिता (अपना संरक्षक) और गुरु (मार्गदर्शक) मानते है। 


अगर बात करे प्राचीन हिन्दू पौराणिक कथाओं की तो ऋषि मुनि तथा आचार्य आदि सब मनुष्य के गुरु ही माने जाते थे। गुरु का कार्य होता है अपने शिष्य को सही राह दिखाना जिससे वो अपने जीवन के मार्ग को सृदृढ़ कर सके। और वाकई प्राचीनकाल के ऋषि मुनि और आचार्य ऐसा ही कार्य करते थे। इसीलिए वो आज भी गुरु के रूप में पूजे जाते है। 

भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे। भगवान परशुराम का विवरण रामायण में भी मिलता है और महाभारतकाल में भी। जबकि रामायणकाल से 1000 या 1500 वर्ष बाद महाभारत का भीषण युद्ध हुआ था।



भगवान रामचन्द्र 
इसी तरह भगवान रामचन्द्र भी रघुकुल में जन्में एक प्रतापी राजा थे वो भी भगवान विष्णु के अवतार थे।  अगर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से देखे तो भगवान राम भारत में आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व अयोध्या नगरी में राज करते थे। कई इतिहासकार भगवान राम को भाषा, साहित्य और दर्शन (फिलोसफी) का जन्मदाता मानते हैं। इस प्रकार भगवान राम अपने राजकाल में प्रजा के लिए राजा के साथ साथ एक गुरु की भूमिका का भी निर्वाह कर रहे थे।   
भगवान परशुराम 
लेकिन भगवान परशुराम को गुरु (शिक्षक ) के रूप में इतना सम्मान आने वाली पीढ़ियों ने नहीं दिया, जितना उनके शिष्य द्रोणाचार्य को दिया गया।  भगवान परशुराम के दो परम शिष्य माने जाते है जिनका विवरण महाभारत में भी है, वे है - देवव्रत (भीष्म पितामह) और द्रोणाचार्य। 

देवव्रत के पिता कुरु वंश के प्रतापी राजा शान्तनु तथा माता माँ गंगा थी।  देवव्रत प्रतापी योद्धा था। देवव्रत को स्वयं भगवान परशुराम ने धनुष, गदायुद्ध, मलयुद्ध तथा राजनीति, धर्म आदि का ज्ञान दिया था। अपने पिता महाराज शान्तनु का विवाह सत्यवती से कराने के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत अपना लिया था। उनकी इस भीष्म प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें भीष्म नाम दिया तथा इच्छामृत्यु का वरदान दिया था। जैसा कि महाभारत में वर्णित है कि भीष्म महापराक्रमी योद्धा था उसने अकेले ही ना जाने कितने वीर योद्धाओं को पराजित किया था और ना जाने कितने ही राज्यों पर विजय प्राप्त करके आर्यावर्त (प्राचीनकाल में भारत का नाम) में सम्मिलित किया था। 


द्रोणाचार्य ऋषि भारद्वाज के पुत्र थे। द्रोणाचार्य ने भी देवव्रत (भीष्म पितामह) की तरह ही भगवान परशुराम राम से शिक्षा - दीक्षा ग्रहण की थी। महाभारत में जैसा वर्णित है गुरु द्रोण को भीष्म पितामह ने ही अपने पोतों (कौरव और पाण्डव) को शिक्षा देने के लिए गुरु के रूप में नियुक्त किया था। गुरु द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों को शिक्षा देते थे, जिनमें उनके सबसे प्रिय शिष्य गाण्डीवधारी अर्जुन थे। गुरु द्रोण ने कौरवों और पाण्डवों को समान रूप से शिक्षा दी थी। लेकिन पाण्डवों के लिए उनकी शिक्षा वास्तव में गुरुवाणी बन गई जबकि कौरवों ने गुरु द्रोण की दी हुई शिक्षाओं का सही रूप से कभी उपयोग नहीं किया। इसीलिए कौरवों का सम्पूर्ण जीवन अधर्म करते हुए नष्ट हुआ जबकि पाण्डवों ने उनकी दी हुई शिक्षा से आर्यावर्त में दोबारा धर्म की स्थापना की। 


गुरु द्रोण को आने वाली पीढ़ियों ने इतना सम्मान दिया की, भारत के सर्वोच्च गुरु पुरस्कार का नाम उन्हीं के सम्मान में "द्रोणाचार्य पुरस्कार" रखा गया है। 

अगर वास्तविक रूप से देखा जाये तो शिक्षा देना शिक्षक का कार्य अथवा धर्म होता है, चाहे उसके शिष्य कैसे भी हो लेकिन शिक्षक अपने हर शिष्य को अपने पुत्र की तरह सीखता है, भले ही वो शिष्य इस शिक्षा का प्रयोग धर्म के लिए करे या अधर्म के लिए इसके लिए उत्तरदायी केवल शिष्य ही होता है। गुरु का कार्य होता है शिक्षा देना और शिष्य का कार्य होता है उस शिक्षा को ग्रहण करके अपने जीवन में उसका सही रूप से प्रयोग करना। सादर … अभिनन्दन।।



क्रमश : आगे भी जारी ……… 

सातदिवसीय लोकप्रिय चिट्ठे