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Wednesday, October 15, 2014

सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के कैप्टन रहे अब्बास अली का निधन

कैप्टन अब्बास अली 

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के करीबी रहे तथा आजाद हिन्द फौज के कैप्टन अब्बास अली का शनिवार (11 अक्टूबर, 2014) सुबह निधन हो गया। कैप्टन अब्बास अली का जन्म 3 जनवरी, सन् 1920 ई. को हुआ था। कैप्टन अब्बास अली 94 वर्ष के थे। शनिवार सुबह सीने में दर्द की शिकायत पर जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहाँ उपचार के दौरान ही कैप्टन अब्बास अली का इन्तकाल हो गया। मूल रूप से बुलंदशहर के गाँव कलंदरगढ़ी के रहने वाले कैप्टन अली ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी।

सन् 1931 ई. में पहली बार कैप्टन अब्बास अली ने अंग्रेजों को ललकारा था। उस वक़्त शहीद-ए-आजम भगत सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने फांसी दी थी। जिसके विरोध में कैप्टन अब्बास अली ने खुर्जा की सड़कों पर अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन किया था। सन् 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरु होने के बाद उन्होंने इंडियन ब्रिटिश आर्मी 
ज्वाइन की थी। सन् 1943 ई. में ब्रिटिश फौज से बगावत करके कैप्टन अब्बास अली आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गए थे। इसके लिए ब्रिटिश हुकूमत ने उनका कोर्ट मार्शल करते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन सन् 1946 ई. में नेहरू - माउंटबेटन समझौता होने के बाद वह मुल्तान के किले की कैद से रिहा हो गए। 

कैप्टन अब्बास अली ने आचार्य नरेन्द्र देव, जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के सम्पर्क में आकर सोशलिस्ट मूवमेंट में भूमिका निभाई। सन् 1966 ई. में वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव बने। बाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी शामिल किये गए। सन् 1975 ई. में आपातकाल के दौरान वह एक बार फिर जेल गए।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तथा आज़ाद हिन्द फौज के सिपाहियों की उपेक्षा से कैप्टन अब्बास अली ताउम्र दुखी रहे। वो कहते थे कि -"आजादी के बाद जब आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को भारतीय फौज में शामिल करने की बात आई तो उस समय की कांग्रेस सरकार ने यह कहा कि यह फौज भारतीय सेना में शामिल नहीं हो सकती है, इनके शामिल होने से सेना का अनुशासन प्रभावित होगा।"

"इसी तरह आजादी के कई दशकों तक हमें स्वतन्त्रता सेनानी का दर्जा ही नहीं दिया गया, हमें स्वतन्त्रता सेनानी नहीं माना गया। बाद में हमें सन् 1972 ई.  में स्वतन्त्रता सेनानी का दर्जा दिया गया।"

कैप्टन अब्बास अली जीवन भर यही दावा करते रहे की नेताजी की मृत्यु फारमोसा के प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी। नेताजी जी की मृत्यु के बारे में क्या कहते थे कैप्टन अब्बास अली :-

"यह कहा जाता है कि अगस्त 1945 में नेताजी की मृत्यु फारमोसा प्लेन क्रैश में हो गई थी। यह सब तो जानबूझकर कही गई बाते हैं। मैं यह बात कैसे मान लूँ जबकि इस घटना के एक हफ्ते बाद सितम्बर 1945 के पहले हफ्ते में सिंगापूर के मेस में उन्हें मैंने अपनी आँखों से देखा है। मैंने उनके साथ खाना खाया और उनका जोशीला भाषण सुना। मेरी इन आँखों ने नेताजी को बोलते हुए, अपने साथ हाथ मिलाते देखा। मैं उनकी मौत की बात पर कैसे यकीन कर लूँ ? नेताजी का राज तो रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की फाइलों में है।"

इसके अलावा कैप्टन कहते थे - "आजादी के बाद क्या हमारी (आजाद हिन्द फौजियों की) मुश्किलें कम हो गई ? हमारे साथ उस समय की कांग्रेस सरकार ने भेदभाव किया। सरकार से उपेक्षा मिलना हमारे लिए कोई नयी नहीं है। मैं जब मुल्तान के किले में कैद था और मुझे फांसी की सजा सुनाई गई तो अंग्रेज़ अफसर ने मुझसे पूछा कि "कैप्टन अंग्रेज़ हुकूमत से बगावत करने का अंजाम जानते हो ?"

मैंने कहा - "हाँ जानता हूँ, मौत और यह भी जानता हूँ कि अगर हिटलर ने इंग्लिश चैनल पार कर लिया होता तो तुम (ब्रिटेनवासी) आज हिटलर के गुलाम होते।"

कैप्टन अब्बास अली भारत के महान स्वतन्त्रता सेनानी थे। उनके निधन पर हम सब उन्हें नमन करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।

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